शुक्रवार 18 सितंबर 2026 - 11:59
इमाम हसन अस्करी (अ) की सीरतः दीन की हिफाज़त, उम्मत की रहनुमाई और ग़ैबत की तैयारी

उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के छज्जुपूरा सादात मे 18 सितम्बर 2026 को मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी साहब की इमामत मे नमाज़ ए जुमा अदी की गई। जिसमे मोमेनीन ने मौलाना द्वारा इमाम हसन असकरी (अ) ने ग़ैबत के दौर मे दीन की हिफ़ाज़त और उम्मत की रहनुमाई पर दिए गए खुत्बो को बड़े ध्यानपूर्वक सुना।

हौज़ा न्य़ूज़ एजेंसी के अनुसार,  उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के छज्जुपूरा सादात मे 18 सितम्बर 2026 को मौलाना सय्यद महदी अब्बास ज़ैदी साहब की इमामत मे नमाज़ ए जुमा अदी की गई। जिसमे मोमेनीन ने मौलाना द्वारा इमाम हसन असकरी (अ) ने ग़ैबत के दौर मे दीन की हिफ़ाज़त और उम्मत की रहनुमाई पर दिए गए खुत्बो को बड़े ध्यानपूर्वक सुना। 

मौलाना ने अपने खुत्बे मे  सूर ए अम्बिया की आयत नंबर 73 جَعَلْنٰهُمْ اَىٕمَّةً یَّهْدُوْنَ بِاَمْرِنَا وَ اَوْحَیْنَاۤ اِلَیْهِمْ فِعْلَ الْخَیْرٰتِ وَ اِقَامَ الصَّلٰوةِ وَ اِیْتَآءَ الزَّكٰوةِۚ-وَ كَانُوْا لَنَا عٰبِدِیْنَۚ  का हवाला देते हुए कहा कि क़ुरआन मे अल्लाह तआला का फ़रमान है कि  “और हमने उन्हें ऐसे इमाम बनाया जो हमारे आदेश से लोगों का मार्गदर्शन करते थे और हमने उनकी ओर नेक काम करने, नमाज़ कायम करने और ज़कात अदा करने की तरह की और वे हमारी ही इबादत करने वाले थे।”

छज्जुपूरा सादात के इमाम ए जुमा ने इस सप्ताह की मुनासबतो की ओर इशारा करते हुए हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ) की विलादत-ए-बासआदत महत्वपूर्ण मुनसाबत बताते हुए कहा कि इमाम की सीरत के एक ऐसे महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देना जरूरी है, जो आज हमारे लिए भी मार्गदर्शन का स्रोत है।

मौलाना ने कहा कि हर इलाही इमाम अपने समय में अल्लाह के मिशन के अमानतदार थे। प्रत्येक इमाम ने अपने समय की परिस्थितियों को देखते हुए दीन की रक्षा और उम्मत की रहनुमाई की जिम्मेदारी निभाई। इमाम हसन अस्करी (अ) का दौर अत्यंत संवेदनशील था। उस समय शिया समाज इतिहास के एक ऐसे नए चरण में प्रवेश करने वाला था, जब अल्लाह की हुज्जत मौजूद तो होंगी, लेकिन लोगों के लिए इमाम तक सीधे पहुंचना संभव नहीं होगा। ऐसे समय में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की निगाह केवल अपने समय की समस्याओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि मौजूदा परिस्थितियों में मक्तब और दीन की रक्षा के साथ-साथ आने वाले दौर की तैयारी भी आवश्यक थी। यदि हम इस पृष्ठभूमि को सामने रखें तो इमाम की सीरत के अनेक पहलुओं की हिकमत और उद्देश्य को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

मौलाना महदी अब्बास ने कहा कि आज भी हमारे युवाओं के बीच कई तरह की गलतफहमियां पैदा की जाती हैं। उनसे कहा जाता है कि जब इमाम मौजूद और जीवित हैं तो फिर तक़लीद की क्या जरूरत है? नायब और नियाबत का मतलब क्या है? ऐसे सवालों का जवाब हमें इमाम हसन अस्करी (अ) की सीरत में मिलता है।

उन्होने कहा कि इमाम ने ख़तों और अपने वकीलों के माध्यम से उम्मत को सही रास्ते पर बनाए रखने की व्यवस्था की। अहले इल्म और अहले-बैत (अ) के सेवकों के माध्यम से उम्मत की इस्लाह और मार्गदर्शन का सिलसिला जारी रखा गया। जब इमाम से सीधे मुलाकात संभव नहीं होती थी, तो आप ख़तों के माध्यम से लोगों की रहनुमाई और इस्लाह करते थे। और जब हर व्यक्ति तक सीधे ख़त के माध्यम से पहुंचना संभव नहीं होता था, तो आप विशेष और भरोसेमंद लोगों का चयन करते और उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाते थे।

दीन की हिफाज़त, उम्मत की रहनुमाई और ग़ैबत की तैयारी

मौलाना महदी अब्बास ने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) ने इसी माध्यम से लोगों के मन और विचार को उस आने वाले दौर के लिए तैयार किया, जिसमें इमाम से प्रत्यक्ष संपर्क संभव नहीं होना था। इमाम ने यह रास्ता भी स्पष्ट किया कि शरीयत के अहकाम किस प्रकार लोगों तक पहुंचाए जा सकते हैं और विद्वानों तथा प्रतिनिधियों के माध्यम से इमाम के आदेशों और धार्मिक मार्गदर्शन से किस तरह लोगों को परिचित कराया जा सकता है। इस मार्ग पर चलते हुए इंसान अल्लाह की ओर अपनी यात्रा को जारी रख सकता है और दीन के सही मार्ग पर कायम रह सकता है।

छज्जुपूरा के इमाम जुमा ने कहा कि आज हमारे इमाम ग़ैबत में हैं। केवल इमाम का इंतज़ार करना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समय हमसे व्यावहारिक जिम्मेदारियों को निभाने का भी तकाज़ा करता है। हमें दीन के प्रति अपनी जिम्मेदारी और धार्मिक मूल्यों से अपनी वाबस्तगी को मजबूत रखना होगा तथा राह-ए-इमामत पर स्थिर रहना होगा। इमाम-ए-ज़माना (अ) के इंतेज़ार का वास्तविक अर्थ यह है कि इंसान अपने जीवन को इमाम की शिक्षाओं के अनुसार ढाले और अपने आपको उनकी मदद और नुसरत के योग्य बनाए।

उन्होने कहा कि अगर हम हक़ीक़त में इमाम-ए-ज़माना (अ) के इंतज़ार में हैं, तो इसका असर हमारे जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देना चाहिए। हमारे अदब, अख़लाक़, तहज़ीब, इबादत, व्यवहार और समाज के प्रति जिम्मेदारी में इमाम की शिक्षाओं की झलक दिखाई देनी चाहिए। विशेष रूप से नई पीढ़ी की धार्मिक और अख़लीक़ी तरबीयत पर ध्यान देना हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मौलाना महदी अब्बास ने कहा कि इंसान का चरित्र और उसका व्यवहार ही उसके दावे और उसके अमल की सच्चाई की गवाही देता है। इसलिए हमें अपने आचरण और जीवनशैली को इस तरह बनाना चाहिए कि हम वास्तव में इमाम-ए-ज़माना (अ) के सच्चे अनुयायी और उनके मिशन के सहायक बनने के योग्य हो सकें।

खु़त्बे के अंत  मे मौलाना ने उपस्थित सभी मोमेनीन के लिए दुआ की, परवरदिगार-ए-आलम हमें आइम्मा की सीरत पर सच्चे अर्थों में अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। और हमे इमाम का हक़ीक़ी मुंतज़िर करार दे।

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